पहले माल की मुस्तहिक़ औलाद होती थी और वालदैन के लिए वसीयत का हक़ था । फिर अल्लाह तआला ने इस में से जो चाहा मंसूख़ कर दिया और लड़कों को लड़कीयों के दुगना हक़ दिया (सूरह अनं निसा आयत 11) और वालदैन को और उनमें से हर एक को छठे हिस्से का मुस्तहिक़ क़रार दिया और बीवी को आठवें और चौथे हिस्से का हक़दार क़रार दिया और शौहर को आधे या चौथाई हिस्से का हक़दार क़रार दिया
(सही बुख़ारी 6739)
नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया मीरास उस के हक़दारों तक पहुंचा दो और जो कुछ बाक़ी बचे उसे सबसे ज़्यादा क़रीबी मर्द रिश्तेदार का हिस्सा है ।
(सही बुख़ारी 6732)
साद बिन रबीअ की बीवी अपनी दो बेटीयों को (जो साद से पैदा हुई थीं) लेकर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास आईं और अर्ज़ किया अल्लाह के रसूल ये दोनों साद बिन रबीअ की बेटियां हैं, उनके बाप आपके साथ लड़ते हुए जंग अहद में शहीद हो गए हैं, उनके चचा ने उनका पूरा माल ले लिया है, और इनके लिए कुछ नहीं छोड़ा, और बग़ैर माल के उनकी शादी नहीं होगी। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया “अल्लाह तआला उस के बारे में फ़ैसला करेगा, चुनांचे उस के बाद मीरास की यह आयत नाज़िल हुई तो रसूलुल्लाह ने सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इन लड़कीयों के चचा के पास ये हुक्म भेजा कि साद की दोनों बेटीयों को माल का दो तिहाई हिस्सा दे दो और उनकी माँ को आठवां हिस्सा, और जो बचे वो तुम्हारा है
(जामे तिर्मिज़ी: 2092)
हज़रत जाबिर बिन अब्दुल्लाह रज़ि अल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है उन्होंने बयान किया कि मैं बीमार हो गया तो रसूलुल्लाह ﷺ हज़रत अबू बकर रज़ि अल्लाहु अन्हु के साथ पैदल चल कर मेरी इयादत के लिए तशरीफ़ लाए। मुझ पर ग़शी तारी थी , चुनांचे रसूलुल्लाह ﷺ ने वुज़ू किया और वुज़ू का कुछ पानी मुझ पर डाला
(इस से मुझे होश आ गया । मैंने अर्ज़ किया ऐ अल्लाह के रसूल मैं क्या करूँ ? अपने माल के बारे में क्या फ़ैसला करूँ ? तब मीरास की वो आयत नाज़िल हुई जो सूरह अन निसा के आख़िर में है
وَاِنْ كَانَ رَجُلٌ يُّوْرَثُ كَللَةً ﴾
’’ जिसकी मीरास ली जाती है अगर वो मर्द या औरत कलाला हो ۔۔۔۔۔۔۔ ‘‘ ( वो आयत उतरी )
قُلِ اللّٰهُ يُفْتِيْكُمْ فِي الْكَلٰلَةِ ﴾
’’ आपसे फ़तवा पूछते हैं । कह दीजीए अल्लाह तआला तुम्हें कलाला के बारे में फ़तवा देता है ۔۔۔۔۔۔۔‘‘
(इब्ने माजा : 2728, सही मुस्लिम 4145)
हज़रत मुआज़ बिन जबल रज़ि अल्लाहु अन्हु हमारे यहां यमन में मुअल्लिम और अमीर बन कर तशरीफ़ लाए । हमने उनसे एक ऐसे शख़्स के तरका के बारे में पूछा जिसकी वफ़ात हुई हो और उसने एक बेटी और एक बहन छोड़ी हो और उसने अपनी बेटी को आधा और बहन को भी आधा दिया हो
(सही बुख़ारी: 6734)
अबू मूसा रज़ि अल्लाहु अन्हु से बेटी , पोती और बहन की मीरास के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि बेटी को आधा मिलेगा और बहन को आधा मिलेगा और तुम इब्ने मसऊद रज़ि अल्लाहु के यहां जाओ, शायद वो भी यही बताएँगे । फिर इब्ने मसऊद रज़ि अल्लाहु अन्हु से पूछा गया और अबू मूसा रज़ि अल्लाहु अन्हु की बात भी पहुंचाई गई तो उन्होंने कहा कि मैं अगर ऐसा फ़तवा दूं तो गुमराह हो जाऊंगा और ठीक रास्ते से भटक जाऊंगा । मैं तो इस में वही फ़ैसला करूँगा जो रसूल अल्लाह ﷺ ने किया था कि बेटी को आधा मिलेगा , पोती को छठा हिस्सा मिलेगा , इस तरह दो तिहाई पूरी हो जाएगी और फिर जो बाक़ी बचेगा वो बहन को मिलेगा । हम फिर अबू मूसा रज़ि अल्लाहु अन्हु के पास आए और इब्ने मसऊद रज़ि अल्लाहु अन्हु की गुफ़्तगु उन तक पहुंचाई तो उन्होंने कहा कि जब तक ये आलिम तुम में मौजूद हैं मुझसे मसायेल ना पूछा करो।
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(बुख़ारी : 6736)
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया है कि अगर मैं इस उम्मत के किसी आदमी को ‘ख़लील’ बनाता तो उनको अबूबकर रज़ि अल्लाहु अन्हु को ख़लील बनाता, लेकिन इस्लाम का तअल्लुक़ ही सबसे बेहतर है तो यहां नबी ﷺ ने दादा को बाप के दर्जा में रखा है।
(सही बुख़ारी : 6738)
माक़ल बिन यसार रज़ि अल्लाहु अन्हु से रिवायत है , उन्होंने फ़रमाया कि रसूलुल्लाह ﷺ ने हमारे ख़ानदान में एक दादा को उसके पोते के तर्के में से छठा हिस्सा देने का फ़ैसला दिया
(इब्ने माजा : 2723)
अबू बकर रज़ि अल्लाहु अन्हु के पास एक दादी या नानी मीरास में अपना हिस्सा पूछने आई, अबू बकर रज़ि अल्लाहु अन्हु ने उससे कहा तुम्हारे लिए अल्लाह की किताब क़ुरआन मैं कुछ नहीं है और तुम्हारे लिए रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सुन्नत में भी कुछ नहीं है, तुम लौट जाओ यहां तक कि मैं लोगों से इस बारे में पूछ लूं, उन्होंने लोगों से इस बारे में पूछा तो मुग़ीरह बिन शोबा रज़ि अल्लाहु अन्हु ने कहा मैं रसूल रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के पास मौजूद था, आपने दादी या नानी को छठा हिस्सा दिया, अबू बकर रज़ि अल्लाहु अन्हु ने पूछा तुम्हारे साथ कोई और भी था? मुहम्मद बिन मुस्लिमा अंसारी रज़ि अल्लाहु अन्हु खड़े हुए और इसी तरह की बात कही जैसी मुग़ीरह बिन शोबा रज़ि अल्लाहु अन्हु ने कही थी। चुनांचे अबू बकर रज़ि अल्लाहु अन्हु ने इस के लिए हुक्म जारी कर दिया, फिर उमर रज़ि अल्लाहु अन्हु के पास दूसरी दादी अगर पहली दादी थी तो दूसरी नानी थी और अगर पहली नानी थी तो दूसरी दादी थी मीरास में अपना हिस्सा पूछने आई। उन्होंने कहा तुम्हारे लिए अल्लाह की किताब क़ुरआन मैं कुछ नहीं है अलबत्ता वही छठा हिस्सा है, अगर तुम दोनों दादी और नानी इकट्ठी वारिस हो तो छठा हिस्सा तुम दोनों के दरमियान तक़सीम किया जाएगा, और तुम में से जो अकेली हो तो वो उसी को मिलेगा
(जामे तिर्मिज़ी : 2101)
हज़रत अबदुल्लाह बिन अब्बास रज़ि अल्लाहु अन्हुमा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने जद्दा नानी या दादी को विरासत में छठा हिस्सा दिया
(सुनन इब्ने माजा : 2725)
तुम लोग ये आयत पढ़ते हो
من بعد وصية توصون بها أو دين
मन बाद वसी तोसोन बेआ नौ दीन “तुमसे की गई वसीयत और क़र्ज़ अदा करने के बाद मीरास तक़सीम की जाएगी रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया “वसीयत से पहले क़र्ज़ अदा किया जाएगा अगर हक़ीक़ी भाई और अलाती भाई दोनों मौजूद हों तो हक़ीक़ी भाई वारिस होंगे, अलाती (सौतेले) भाई वारिस नहीं होंगे, आदमी अपने हक़ीक़ी भाई को वारिस बनाता है अलाती भाई को नहीं
(जामे तिर्मिज़ी : 2094)
नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया “दो मुख़्तलिफ़ मज़हब के लोग एक दूसरे के वारिस नहीं होंगे
(जामे तिर्मिज़ी : 2108)
नबी अकरम सल्लल्लाहुअलैहि वसल्लम ने फ़रमाया “क़ातिल मक़्तूल का वारिस नहीं होगा
(जामे तिर्मिज़ी : 2109)
IIRC is based in New Delhi, India. IIRC undertakes various activities to create awareness in the Muslim society about the Islamic obligation of Distribution of Inheritance after the death of a person or multiple persons in a family
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